रविवार, 17 नवंबर 2019

फ़लसफ़ा

अपनी ज़िंदगी का बस यही फ़लसफ़ा रहा,
रास्ते मिलते रहे और मैं चलता रहा।

मंज़िलों कि ना फ़िक्र थी, ना कोई पता रहा,
रहगुज़र मिलते रहे और मैं चलता रहा।

खिड़कियों से झाँकती-नज़रों का उम्र भर पहरा रहा,
बेअदब मिलते रहे और मैं चलता रहा।

सिसकियाँ भी थी कहीं, उम्मीदों का ज़ख़ीरा रहा,
बेसबर मिलते रहे और मैं चलता रहा।

अँधेरा बड़ा था या कि कोहरा घना रहा?
बेक़दर मिलते रहे और मैं चलता रहा।

कह रहा था कोई 'निश्छल' अब नहीं रहा!
बेख़बर मिलते रहे और मैं चलता रहा।

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#Nishchhal