मंगलवार, 1 मई 2018

रिवायत


दूर-जाने की रिवायत1भी अब निभानी होगी,
एक-अर्सा जो हो गया है सबको जानते हुए।
मोहब्बत लत-सी हो जाये तो फ़िर टूटता रहा है दिल अपना,
सो ये मालूम था के हम मिले ही हैं बिछड़ जाने के लिए॥

फ़िर किसी नुक्कड़-गली में मिल जाएँ कभी,
ग़र्क कर दें गीले-शिक़वे जो कह ना पाए कभी।
फ़िक्र ये नहीं के हमको भूल जाओगे,
शायद हम कहीं ना भूल जाएँ कभी॥

गिरफ़्त में हूँ अपनी हीं कैफ़ियत2-का,
बाजुएँ खोल दूँ तो भी समा ना पाओगे।

आदमी हूँ बस इतनी हीं हैसियत का,
हक़ से बैठा है दर्द मालिक़ बना अपनी मिल्क़ियत का॥

रंज़िश ही सही,
ख़ुद हीं से निभा रहे हैं 'निश्छल'।
रूहानी इश्क़-सा,
ईबादत3 सी निभा रहे हैं॥

1. रिवायत = परंपरा, 2. कैफ़ियत = परिस्थिति, 3. ईबादत = पूजा

----------------------------------

door jane ki riwayat bhi ab nibhani hogi,
ek arsa jo ho gaya hai sabko jante huye.
mohobbat lat si ho jaye to phir tootta raha hai dil apna,
so ye maloom tha ke hum mile hi hain bichhad jane ke liye.

phir kisi nukkad-gali mein mil jayein kabhi,
gark kar dein gile-shikve jo kah na paye kabhi.
fiqr ye nahi ke humko bhool jaoge,
shayad hum kahin na bhool jayein kabhi.

giraft mein hoon apni hi kaifiyat ka,
bajuyein khol doon to bhi sama na paooge.
aadmi hoon bas itni hi hasiyat ka,
haq se baitha hai dard malik bana apni milqiyat ka

ranjish hi sahi,
khud hi se nibha rahe hain 'nishchhal',
roohani ishq sa,
ibaadat si nibha rahe hain.

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

(आपकी बहुमूल्य टिप्पणियों का स्वागत है)