शनिवार, 16 मई 2015

उलझे सपने

यूँ तो मेरे ख्वाबगाह में रक्खे हैं कई उलझे हुए सपने
चाँद आता है पूनम कि रात में, कोई उनमें से सुलझ जाता है।
फिर शुरू होती है अमावस से लुका-छीपी
और हर रात कुछ नया फिर उलझ जाता है॥

यूँ सुलझने-उलझने में जिन्दगी इस तरह बीती है
कि अपने हालात पे भी तरस आता है।
टकटकी बाँध के निहारा करता हूँ सितारों को फिर
बस उनका ही साथ समझ आता है॥

मेरी इन पंक्तियों को विस्तार कुछ इस तरह मिला:
[साभार: Kastoor: the fragrance within by कुन्जेश कौशिक ]

तेरी याद में बदस्तूर भटकता हूँ मैं अब
जैसे कि भुलभूलैया में कोई राही अटक जाता है।
तेरी आस मेरी साँसों से यों रूठ बैठी है
जैसे जुल्फों से कोई मोती झटक जाता है॥

फिसलती रेत को मुठ्ठियों में कैद करना मुमकीन न था
जाने क्यूँ हर बार सन्नाटा मेरे दिल में बैठ जाता है।
मेरे ख्वाब, मेरी रूह, मेरे जिस्म के वो घाव
हर बार वक्त मेरे दिल कि धड़कने ऐंठ जाता है॥

अब तो दिन के ये आलम हैं कि हवा का हर झोंका
मेरी साँसों को परख जाता है।
हर बार छुपाकर रखता हूँ मैं दिल अपना
कमबख्त हर बार कोई जान हथेली पर रख जाता है॥

यूँ तो मेरे ख्वाबगाह में रक्खे हैं कई उलझे हुए सपने
चाँद आता है पूनम कि रात में, कोई उनमें से सुलझ जाता है।
फिर शुरू होती है अमावस से लुका-छीपी
और हर रात कुछ नया फिर उलझ जाता है॥

यूँ सुलझने-उलझने में जिन्दगी इस तरह बीती है
कि अपने हालात पे भी तरस आता है।
टकटकी बाँध के निहारा करता हूँ सितारों को फिर
बस उनका ही साथ समझ आता है॥